Kadam Kahan Ab Rukte Hain | Dr. Manorama Singh | Neelam Pablication
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Kadam Kahan Ab Rukte Hain | Dr. Manorama Singh | Neelam Pablication
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‘कदम कहाँ अब रुकते हैं’ डॉ. मनोरमा सिंह का ऐसा काव्य-संग्रह है जो जीवन के संघर्ष, आशा, संवेदना, आत्मबल और सामाजिक यथार्थ को एक साथ समेटता है। इस संग्रह में जीवन-दर्शन, राष्ट्रीय चेतना, आध्यात्मिक दृष्टि, मानवीय रिश्तों की गहराई और समकालीन समाज की जटिलताओं का प्रभावशाली चित्रण मिलता है।
कवयित्री की लेखनी में एक ओर देशप्रेम, शौर्य, सांस्कृतिक गौरव और अपने मूल्यों के प्रति अटूट आस्था दिखाई देती है, तो दूसरी ओर सामाजिक विडंबनाओं, मानवीय संवेदनाओं, आत्मसंघर्ष और उम्मीद की उजली किरणों का सजीव चित्रण भी मिलता है। इन कविताओं में कहीं इतिहास की उपेक्षा पर तीखा प्रश्न है, कहीं मौन की शक्ति का गहन दर्शन, तो कहीं आधुनिक जीवन की उलझनों पर गहरी संवेदना।
कवयित्री बताती हैं कि जीवन केवल सफलताओं का नहीं, टूटन और पुनर्निर्माण का भी सफ़र है। निराशा के बीच उम्मीद, संघर्ष के बीच साहस और भ्रम के बीच आत्मबोध—इन्हीं भावों की सशक्त अभिव्यक्ति इस काव्य-संग्रह को विशिष्ट बनाती है। प्रवासी भारतीयों की भावनाओं से लेकर आत्मसंघर्ष तक, हर कविता पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है।
‘कदम कहाँ अब रुकते हैं’ उन पाठकों के लिए है जो कविता में विचार, संवेदना और जीवन-दर्शन की खोज करते हैं। यह संग्रह पाठक को ठहरकर सोचने, महसूस करने और आगे बढ़ने का संकल्प देता है।
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