Man Upvan | BY Ashutosh Dwivedi | Neelam Publication
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जीवन एक यात्रा ही तो है, एक लंबी यात्रा, जिसमे अनुभव, हर मोड़ पर मिलते हैं। कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जिन्हे हम खुल कर सब से साझा कर सकते हैं और करते भी हैं। लेकिन कुछ भावनाएँ ऐसी होती हैं जो कह भी दी जाएँ तो भी कुछ बाक़ी सा रह जाता है। तब जो उद्यम सबसे अधिक उपयोगी सिद्ध होता है वो है कविता करने का उद्यम, लेकिन इस उद्यम के लिए भाव के साथ भाषा का ज्ञान और समझ होना भी बहुत आवश्यक है।
ये ज्ञान होते हुए भी अगर आप जीविकोपार्जन के लिए किसी व्यवसाय या नौकरी में व्यस्त हैं, तब बहुत कठिन हो जाता है पृष्ठों पर शब्दों को ठहरा देना, प्रभाव के साथ। इस दुष्कर कार्य को सिद्ध किया है आशुतोष जी ने अपने चौथे काव्य-संग्रह, “मन-उपवन” से।
ऐसा नही है कि बस ये चौथा संग्रह ही उनके उद्यम का प्रमाण है, इसके उलट, ये कहना अधिक उचित होगा कि इस संग्रह के साथ उन्होंने चौथी बार इस बात का प्रमाण दिया है कि जीवन मे व्यस्तता चाहे जितनी भी हो, संगीत, कविता और रंग के लिए समय निकाले जा सकने की संभावना होती ही है।
इस संग्रह की कविताएँ किसी एक विषय या भाव पर ना हो कर, जीवन के विभिन्न आयाम दर्शाती हैं। भावनाओं का अतिरेक कहीं नही दिखता, कवि जीवन की यात्रा को स्वीकारता हुआ अपने पथ पर निरंतर चलायमान है। वह अनियमितताओं को देखकर विचलित तो एकदम नहीं लेकिन अचंभित जरूर होता है कहीं-कहीं, और इसके परिणाम स्वरूप वह स्वयं से वार्तालाप कर सकने मे समर्थ और दक्ष हो चुका है।
कविताओं का वैविध्य स्वीकार्य है क्योंकि शीर्षक ही कहता है कि ये कविताएँ मन के उपवन के विभिन्न रंग हैं। आशुतोष जी की कविताओं मे चित्रित व्यक्ति-विशेष को अपने विजय का पूर्ण विश्वास है और वह अपनी विषम परिस्थितियों को जीत चुका है या जीतने की चेष्टा मे है। संभवतः यह व्यक्ति-विशेष, उनके स्वयं के अंतर्मन का ही बिम्ब हो। कविताएँ निराशावाद को पूरी तरह से नकारती हैं और एकदम प्रतिकूल परिस्थितियों में भी आशान्वित रहती हैं, करती हैं।
Man Upvan | BY Ashutosh Dwivedi | Neelam Publication
Man Upvan | BY Ashutosh Dwivedi | Neelam Publication

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