Udgar
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“उद्गार का समर्पण”कवि और कविता, साहित्य और सृजन, परिवेश और ग्राह्यता सब कुछ स्वयं की सोच पर निर्भर करता है, आप अपने अंदर का विचार लोगों को कितना और किस तरह परोसना चाहते हैं,वह व्यक्ति परक है या समाज परक? यह भी अपरिहार्य चिन्तन है कि वस्तुस्थिति का अंतर्वस्तु प्रस्फुटन किस सीमा तक का स्पर्श करता है, रचना धर्मिता को स्वीकार्य करने वालों का भी ऋंखला-प्रकार और मानक होता है, रस- छन्द -अलंकार -भाव विन्यास, उपमा-उपमेय-उपमान आदि का सामंजस्य किसी भी काव्य विधा को अनुपमेय और स्तरीय बनाता है, हम-हमारी रचना चिन्तन के उस फलक से संपृक्त है जिसमें मानवीय आचरण प्रकृति के अन्य अवयव के लिए कितना स्वीकार्य है, प्रतीक और प्रतिमान का औचित्य केवल और केवल विचारक प्रबुद्धता ही कर सकती है, जब हमारे भावों की भंगिमाएं अक्षर, शब्द, स्वर भाव बनकर किसी कोरे पन्नों को अभिलिखित करते हैं तो यही स्वयं को भोक्ता रचनाकार कवि के रूप में स्थापित करता है ।
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